ईशावास्योपनिषद क्या है परिचय


ईशावास्योपनिषद शुक्ल यजुर्वेद का 40 वां अध्याय है । इसमें कुल 15 मंत्र हैं । संपूर्ण जगत ईश्वर से बना है, यह एक छोटा उपनिषद है इसमें गीता के 18 अध्याय के 18 मंत्र हैं । इशावस्यम प्रथम मंत्र के होने के कारण इसे ईशावास्योपनिषद कहा जाता है । पूरा जगत ईश्वर के द्वारा निर्मित है। संपूर्ण जगत ईश्वर ही है, ऐसा ईशावास्योपनिषद में कहा गया है ।

त्याग पूर्वक उपभोग करो । दूसरों की धन की आकांक्षा नहीं करनी चाहिए। अनुशासित जगत में 100 वर्ष तक जीने की कामना की गई है। देवों की तरह कर्म करें, इसमें ईश्वर का आवास दृश्य जगत और जीवन है । इसमें कर्म निष्ठा की अवधारणा दी गई है जिसमें 100 वर्षों तक जीने की बात कही गई है। जिसमें पहला ब्रह्मचर्य गृहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास अनुशासित जगत का उल्लंघन करने वाले को अर्थात आत्मा का हनन करने वाले को आसुरी कहा गया है।

इसके 18 मंत्रों में निम्न प्रकार से चर्चा की गई है जीवन व जगत ईश्वर की आवाज जीवन संपदा यह धन किसका है। ऋषि ने मनुष्य को अभिमान मुक्त किया है। अनुशासन के उल्लंघन के दुष्परिणाम परमब्रह्मा का स्वरूप 100 वर्षों तक जीने की इच्छा कर्म न करने पर पाप लगता है। निष्काम कर्म को समभाव के साथ विद्या ,अविद्या, चेतना पारक जो ज्ञान है उसे ब्रह्म विद्या, आध्यात्मिक परमात्मा प्राप्ति के लिए ज्ञान को विद्या कहा जाता है । लेकिन जो केवल भौतिक विज्ञान है उसे अविद्या कहा गया है।
ब्रह्म भाव ईश्वर की स्तुतिया अजन्मा है इसकी आकृति नहीं है सर्वजन है। जो शौक से रहित है वह ब्रह्म भाव है। आत्मा भाव, आत्मा परमात्मा पर नेतृत्व करने वाली आत्मा है , आत्मा को परमात्मा माना गया है जो भी व्याप्त है।

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