यौगिक चिकित्सा का महत्व एवं इसमें प्रयोग होने वाली विभिन्न क्रियाएं और इनके लाभ

यौगिक चिकित्सा :- यौगिक चिकित्सा से तात्पर्य योग विज्ञान द्वारा रोग का निवारण. चिकित्सा का सामान्य अर्थ उपायों से है जिनसे रोग दूर होता है।

आयुर्वेद में कहा गया है आसन प्राणायाम मुद्रा बंद शुद्धि क्रिया एवं ध्यान का उपयोग करें।

विभिन्न रोगों की चिकित्सा करना है यौगिक चिकित्सा का उद्देश्य है। एक स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा एवं रोग ग्रस्त व्यक्ति को रोगों से मुक्ति दिलाना है।

जन्म से लेकर मृत्यु परिणत मनुष्य अनेक रोगों से ग्रस्त होता है जिसमें शारीरिक मानसिक एवं स्वाभाविक व्याधियों होती हैं। मन और शरीर को लोगों का अधिष्ठान कहा गया है।

भूख, प्यास, जरा, वृद्धावस्था, मृत्यु और निद्रा स्वाभाविक व्याधियां कहलाती है। आयुर्वेद के अनुसार दोष अग्नि धातु मल शारीरिक क्रियाओं की सामान्य अवस्था एवं आत्मा इंद्रियों और मन की प्रसन्नता को स्वास्थ्य कहते हैं।

अष्टांग योग का विभिन्न रोग चिकित्सा मैं उपयोग तेजी से बढ़ता जा रहा है। आसन, प्राणायाम, शुद्धि क्रिया, बंद, मुद्रा और ध्यान के द्वारा रोग निवृत्ति संभव है।

आसन- शरीर और मन की एकाग्रता एवं स्वस्थ संबंध के लिए शरीर की विशेष स्थिति खड़े होना बैठना और लेटने की अवस्था होती है। इन अवस्थाओं में मुख्यतः शरीर की मांसपेशियां, कंकाल तंत्र और तंत्रिका तंत्र प्रभावित होता है।

इन आसनों के लाभ निम्नलिखित है शरीर का लचीलापन बना रहता है। मांसपेशियों में खिंचाव से रक्त प्रवाह अच्छे से होता है। जिससे मांसपेशियां अधिक कार्यशील और मजबूत होती है।

हड्डियों के जोड़ अधिक क्रियाशील मुलायम और मजबूत होते हैं। अंग विशेष के लिए किए जाने वाले आसन से उस अंग की कार्य क्षमता में सुधार होता है तथा रोग अवस्था दूर होती है। तंत्रिका तंत्र अधिक कार्यकारी एवं स्वस्थ हो जाता है।

प्राणायाम- स्वास्थ्य प्रक्रिया का नियंत्रित अभ्यास प्राणायाम कहलाता है। इसके द्वारा व्यक्ति विशेष ढंग द्वारा श्वाश लेता है एवं निष्कासित करता है। इस विशिष्ट श्वसन प्रक्रिया के लाभ है।

हुस हुस अधिक मात्रा मे ऑक्सीजन का संचय करते हैं शरीर को अधिक मात्रा में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाने से शरीर के विभिन्न अंग मस्तिष्क, हृदय, यकृत आदि अपना कार्य अधिक अच्छे ढंग से करते हैं। इससे सकारात्मक जीवनी शक्ति की वृद्धि और नकारात्मक शक्ति का ह्रास होता है।

शोधन क्रियाएं- शरीर शोधन क्रियाओं के द्वारा शरीर की आंतरिक शुद्धि होती है नासा मार्ग मुख्य मार्ग गुदा मार्ग एवं मूत्र मार्ग से शरीर का शोधन इन क्रियाओं द्वारा किया जाता है।

बंध और मुद्राएं- बंद और मुद्राओं के नियमित अभ्यास से शरीर की अनैच्छिक क्रियाओं पर नियंत्रण करना संभव है। हृदय की गति को कम करना बिना नासिका रंद्र को दबाए स्वर परिवर्तन इसके सामान्य उदाहरण है।

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