ईशावास्योपनिषद के अनुसार विद्या और अविद्या की अवधारणा | ईशावास्योपनिषद के अनुसार ज्ञान और कर्म

ईशावास्योपनिषद के अनुसार विद्या और अविद्या की अवधारणा:

अन्ध॑तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाताः ॥ ९ ॥

जो भी मनुष्य भोगो के वशीभूत आसक्ति रखकर उन्हें पाने के लिए अविद्या को साधन रूप मानकर भिन्न भिन्न प्रकार के कर्मो का अनुष्ठान करते रहते है। वह फलस्वरूप उन्ही कर्मो में अज्ञान व अंधकार से परिपूर्ण अनेक प्रकार की योनियों और भोगो को ही जाते है।

इस प्रकार के मनुष्य जन्म के परम उद्देश्य को ना पाकर बार बार जन्म मृत्यु रूपी संसार के प्रवाह में पड़े रहकर भिन्न भिन्न प्रकार की योनियों में ताप सहन करते रहते है।

दूसरे जो लोग नाही भीतर की शुद्धि के लिए कोई कर्म करते है और अभिमान में रहकर कर्म करते है और नाही विवेक – वैराग्य के ज्ञान के प्राथमिक साधनों का आचरण करते हैं लेकिन मात्र शास्त्रों को पढ़कर सुनकर स्वयं मेंविद्या का ज्ञान का मिथ्या आरोप करके ज्ञानाभिमानी बन बैठते है।

इस प्रकार के मिथ्या मनुष्य स्वयं को क्या नहीं मानकर हमारे लिए कोई भी कर्तव्य नहीं इस प्रकार बोलकर कर्तव्य कर्मों का त्याग कर देते हैं और इंद्रियों के वश में होकर शास्त्र विधि से विपरीत अपने अनुसार मनमाना आचरण करने लगते हैं। इससे वे लोग सकाम भाव से कर्म करने वाले विषय आसक्त मनुष्यो की अपेक्षा भी और अधिक अंधकार, पशु पक्षी, कुकर शुकर आदि नीच योनियों को और कुंभी पाक आदि घोर नरको को प्राप्त होते हैं।

अन्यदेवाहुर्विद्ययान्यदाहुरविद्यया
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ।। १० ।।

ज्ञान का यथार्थ स्वरूप सर्वोत्तम फल प्राप्त कराने वाले हैं इसी प्रकार कर्म का स्वरूप सर्वोत्तम फल प्राप्त कराने वाले है यदि आप कर्म कर रहे तो उसमें करता पन के अभिमान का अभाव , राग द्वेष और फल कामना का अभाव एवं अपने वर्णाश्रम तथा परिस्थिति के अनुरूप केवल भगवत सेवा के भाव से श्राद्ध पूर्वक शास्त्र विहित कर्मो का यथा योग्य सेवन ।ऐसे कर्मो के करने से सारे दुर्गुण और दुराचार का नाश हो जाता है और हर्ष- शोकादि समस्त विकारों से रहित होकर साधक इस संसार से पार हो जाता है।

विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभय सह ।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते ॥ ११

अकर्मावस्था के तत्व को न समझने के कारण मनुष्य अपने को ज्ञानी तथा संसार से ऊपर उठे हुए मान लेते है । अतः वह स्वयं को पुण्य पाप से अलिप्त मानकर मनमाने कर्माचरण में प्रवृत्त हो जाते है या कर्मो को भाररूप मानकर उन्हें छोड़ देते है और आलस्य निद्रा तथा प्रमाद में अपने दुर्लभ मानव जीवन के अमूल्य समय को नष्ट कर देते है।

इन दोषों से कैसे बचे। इसके लिए मनुष्य को कर्म और ज्ञान को ठीक से समझकर उनका प्रयोग करना चाहिए। जो भी मनुष्य दोनों बातों को ठीक से समझ लेता है उसकी जीवन यात्रा सुखपूर्वक से चलती है।

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