मूर्खो का उत्तर दक्षिण

मूर्खो का उत्तर दक्षिण: दो यक्ति आपस मे बात कर रहे होते है। एक का नाम अभिष होता है और दूसरे का नाम विनोद। तभी देखते ही देखते उत्तर दिशा की बात आ गई। अभिष बोलता है उत्तर दिशा इधर है जबकि वह दक्षिण दिशा होती है।

विनोद उसे कहता है उत्तर दिशा इधर है लेकिन वह अपनी बात पर अड़ा रहता है और कहता है क्या बात कर दी।
विनोद उसे बहुत तर्क देता है पर वह अपनी बात पर अड़ा रहता है।

वो कहते है ना मूर्खो के साथ बहस नही करनी चाहिए।
फिर एक तर्क स्कूल में पढ़ी बात का भी आता है।
जो कविता हमे स्कूल में पढ़ाई जाती है
उगता सूरज जहाँ वहां मुँह करके
ठीक सामने पूर्व होता
पीठ पीछे पश्चिम
बायीं ओर दिशा उत्तर की
दायीं और दक्षिण

यह कविता अभिष को सुनाने के बाद भी वह अपनी बात पर अड़ा रहा। वह कहते है ना भैस के आगे बीन बजाकर कोई फायदा नही ।बात जब बहुत बिगड़ गयी और अभिष नही माना और उठकर बाहर चला गया । और तुरंत फिर अंदर आ गया।

फिर विनोद को कोई चारा ना दिखा । विनोद वास्तुशास्त्र भी जानता है जिसके कारण दिशाओ का ज्ञान उसे था। फिर विनोद ने दिशा सूचक यंत्र कम्पास निकाला और अभिष को उत्तर दिशा दिखाई ।
उसी प्रकार अपनी चलाने वाले किसी भी यक्ति के आगे कभी कोई बात ना रखे । क्योकि वह सदैव अपनी ही चलाएगा।
चाहे आप ने कितनी सही बात कही हो , कोई विशेष लाभ नहीं होगा।

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