कठोपनिषद

कठोपनिषद :- यजुर्वेद की कठ शाखा से इसका निर्माण हुआ है। यह दूसरे अध्याय की तीसरी वल्ली है, इसमें वाजश्रवा ऋषि, नचिकेता और यम का संवाद है।

वाजश्रवा की कहानी –

पुराने समय में यज्ञ के समय कुछ ना कुछ अपनी प्रिय वस्तु दान देने की प्रथा थी। तब वाजश्रवा ऋषि ने बहुत ही बड़ा यज्ञ करवाया। उसी समय नचिकेता ने अपने पिता से यह प्रश्न किया कि “आप की सबसे प्रिय वस्तु कौन सी है”। तब वाजश्रवा जी ने उत्तर दिया कि मेरी सबसे प्रिय वस्तु तुम हो। नचिकेता के बार-बार प्रश्न पूछने से वाजश्रवा ऋषि ने गुस्से में आकर उत्तर दिया की मैं तुम्हें यम को दान में दूंगा।

यह सब ऋषि ने गुस्से में कहा था। यह सुनकर नचिकेता यमलोक चले गए यमराज वहां नहीं थे। वहां उनकी पत्नी थी उन्होंने नचिकेता से पूछा कि पुत्र तुम कौन हो। तो नचिकेता ने उत्तर दिया कि मैं यमराज से मिलना चाहता हूं। उनकी पत्नी ने उत्तर दिया कि वह यहां नहीं है वह 3 दिन बाद आएंगे।

नचिकेता 3 दिन तक भूखे प्यासे यमराज के घर के बाहर बैठे रहे। यह देख कर यमराज अति प्रसन्न हुआ। उन्होंने उस बालक से प्रश्न किया। बालक तुम कौन हो और यहां क्यों आना चाहते हो। क्या तुम्हें पता नहीं है कि मैं कौन हूं मुझसे तो हर व्यक्ति भयभीत रहता है। मेरे द्वार पर कोई नहीं आना चाहता पर तुम 3 दिन से मेरी प्रतीक्षा में भूखे प्यासे बैठे हो। मैं तुम्हें देख बहुत प्रसन्न हूं। यह देख कर यमराज ने नचिकेता को 3 वर दिए।

पहला मेरे पिता का गुस्सा शांत हो जाए वह पहले जैसा व्यवहार करें।
दूसरा अग्नि विद्या का ज्ञान मुझे दीजिए। अग्नि विद्या वह है जिसको स्वर्ग लोक में पाकर लोग अमृत्व की प्राप्ति करते हैं।
तीसरा मृत्यु के बाद आत्मा का क्या होता है।
यमराज छोटे से बालक की बात सुन चिंतित हो गए। तो उन्होंने उस बालक से कहा तुम यह वर क्यों मांगना चाहते हो।

नचिकेता ने उत्तर दिया यदि धन आप मुझे दोगे तो वह मैं अपने पुरुषार्थ से भी कमा लूंगा। अपनी मृत्यु में कब तक रुकूं विषय भोग की वस्तु 1 दिन खत्म हो जाएगी। अत्यंत गोपनीय ज्ञान मैं आपको देता हूं। सुनकर यमराज ने उन्हें आत्मा का ज्ञान दिया।

आत्मा अमर है वह पैदा नहीं होती ना मरती है जब मृत्यु होती है तो कर्म के अनुसार उनको योनि मिलती है। जो श्रेष्ठ काम करते हैं वह अमरत्व को प्राप्त होते हैं जो लोग उत्तम काम करते हैं श्रेष्ठ कर्म करते हैं वह जीवन मरण के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं।

जब मन का हमारी ज्ञानेंद्रियां के साथ मिलकर स्थिर नियंत्रण प्राप्त हो जाता है तो उस शक्ति क्षीण हो जाती है। तभी जाकर व्यक्ति परम गति को प्राप्त करता है। आत्मा विकार रहित है। आत्मा को रथी कहा गया है। आत्मा शरीर धारण करती है।

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