अनुलोम विलोम प्राणायाम का वैज्ञानिक विश्लेषण | प्रभाव | विधि

अनुलोम विलोम प्राणायाम क्यों किया जाता है?

आइए सबसे पहले जान लेते हैं कि इस प्राणायाम की आवश्यकता क्यों है और क्यों हम इसका अभ्यास करते हैं।

यदि हम अनुलोम विलोम प्राणायाम का वैज्ञानिक अनुसरण करें तो इसका उद्देश्य मस्तिष्क के दोनों हिस्सों बाएं मस्तिष्क तथा दाएं मस्तिष्क को नियंत्रित करना है अर्थात  और सिंपैथेटिक नर्वस सिस्टम और पेरासिंपैथेटिक नर्वस सिस्टम को बैलेंस करना है।

इस प्राणायाम में जब हम श्वास बाएं नासिका से भरते हैं तो यह दाएं मस्तिष्क को सक्रिय करने का कार्य करता है, और जब हम श्वास दाईं नासिका से लेते हैं तो यह बाएं मस्तिष्क को सक्रिय करने का कार्य करता है।

दायाँ मस्तिष्क शांत भावनाओं एवं आध्यात्मिक विचारों वाला होता है। जिनका दायां मस्तिष्क ज्यादा एक्टिव होता है उनका झुकाव आध्यात्मिकता की ओर होता है। वही जिनका बाया मस्तिक ज्यादा क्रियाशील होता है वह क्रिएटिव होते हैं, कैलकुलेशन वाले होते हैं, बिजनेस की प्रवृत्ति उनमें होती है और ज्यादा साइंटिफिक होते हैं।

एक अध्ययन के मुताबिक एक स्वस्थ व्यक्ति अपने पूरे जीवन काल में अपने दिमाग का केवल 3% ही प्रयोग में लाता है। अर्थात मनुष्य कभी भी अपने दिमाग का पूर्णतया प्रयोग नहीं कर सकता है लेकिन प्राणायाम के अभ्यास से इसको बढ़ाया जा सकता है।

नासिका के दोनों छिद्रों में कभी भी वायु एक समान अंदर नहीं जाती , कभी हमारी बाईं नासिका ज्यादा एक्टिव रहती है तो कभी हमारी दाईं नासिका ज्यादा एक्टिव रहती है , इसीलिए अनुलोम विलोम प्राणायाम का अभ्यास दाएं और बाएं मस्तिष्क को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है। और दोनों मस्तिष्क नियंत्रण में तब आते हैं जब हमारी दोनों नासिका से बराबर मात्रा में श्वास आती और जाती है

हमारे दिमाग का वजन शरीर के कुल वजन का 2% होता है और जब कि यह शरीर के कुल ऑक्सीजन का 20% अकेले इस्तेमाल करता है ब्रेन में ऑक्सीजन की कमी के कारण कई प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं चाहे वह शारीरिक हो या वह मानसिक हो।

जो बच्चे पढ़ने में कमजोर होते हैं उनके ब्रेन में ऑक्सीजन की मात्रा का आभाव होता है। ऑक्सीजन हमारे शरीर में नासिका के माध्यम से फेफड़ों को और फेफड़ों के माध्यम से रक्त को और रक्त के माध्यम से ब्रेन को और पूरे शरीर को जाता है।

ब्रेन में ऑक्सीजन की मात्रा को बढ़ाने के लिए  ही प्राणायाम का अभ्यास किया जाता है यही कारण है कि प्राणायाम का अभ्यास किया जाता है।

ग्रंथियों पर अनुलोम विलोम का प्रभाव-

अनुलोम विलोम प्राणायाम का विशेष महत्व है यह प्राणायाम हमारी ग्रंथियों पर एक विशेष प्रभाव डालता है इसके निरंतर अभ्यास से हाइपोथैलेमस एवं पिट्यूटरी ग्लैंड पर विशेष प्रभाव पड़ता है यह हाइपोथैलेमस एवं पिट्यूटरी ग्रंथि  को उत्तेजित करने का कार्य करता है , पिट्यूटरी को शरीर की मास्टर ग्रंथि कहा जाता है क्योंकि यह पूरे शरीर की ग्रंथियों  को बैलेंस करने का कार्य करती है और वहीं हाइपोथैलेमस को सुपर मास्टर ग्लैंड कहा जाता है।

कैसे करें अनुलोम विलोम का अभ्यास?

अनुलोम विलोम के अभ्यास के लिए सबसे पहले आप आसनों का अभ्यास अवश्य कर लें, क्योंकि आसनों से शरीर में लचीलापन आता है और स्थिरता आती है यदि आप आसनों का अभ्यास नहीं करते हैं तो कहीं ना कहीं शरीर में एक तनाव साफ बना रहता है और शरीर स्टेबल नहीं रह पाता है इसलिए जरूरी है कि इससे पहले कुछ आसनों का अभ्यास अवश्य करें या फिर चार पांच राउंड सूर्य नमस्कार जरूर कर लें।

विधि-

सुख पूर्वक किसी भी आसन में बैठ जाए। कमर गर्दन को सीधी रखें। अपने बाएं हाथ की ज्ञान मुद्रा बनाएं और अपने बाएं घुटने के ऊपर रखते वही दाएं हाथ की विष्णु  मुद्रा बनाकर सबसे पहले दाएं नासिका को अपने अंगूठे से बंद करें और बाईं नासिका से लंबी गहरी और धीमी श्वास भरे, उसके बाद दाईं नासिका से उस श्वास को छोड़ दें। फिर दाईं नासिका से लंबी गहरी श्वास भरें और बाईं नासिका से छोड़ दें। इसी प्रकार का अभ्यास प्रतिदिन 10 मिनट तक करें। ध्यान रहे आपको श्वाश को रोकना नहीं है केवल लेना है और छोड़ना है।

अनुलोम विलोम का अभ्यास करते समय आपको केवल अपने श्वसन के प्रति सजग रहना है और विचारों को अपने मन में नहीं आने देना है यह तब संभव है जब आप श्वसन के सेंसेशन को महसूस करेंगे, श्वास को लयबद्ध तरीके से लेना है उसे बीच में तोड़ना नहीं है।

अपने दूसरे आर्टिकल में हम आपको बताएंगे अनुलोम विलोम और नाड़ी शोधन प्राणायाम में अंतर।

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